आशीष श्रीवास्तव
इटावा। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में स्थित ऐतिहासिक सैय्यद दरगाह की बेदखली का मामला अब कानूनी पेजों में उलझ गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय से हुई एक शिकायत के बाद, वन विभाग ने इस मजार को अवैध निर्माण बताते हुए ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी किया था। सोमवार को सामाजिक वानिकी न्यायालय (DFO कोर्ट) में इस मामले की अहम सुनवाई हुई, जिसमें मजार पक्ष को साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए अंतिम मोहलत दी गई है।
मुख्यमंत्री कार्यालय की शिकायत पर शुरू हुई कार्रवाई

इटावा के बीहड़ (फिसरवन क्षेत्र) में स्थित इस प्राचीन मजार को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब 23 जनवरी को वन विभाग ने इसे आरक्षित वन क्षेत्र में अवैध निर्माण बताते हुए नोटिस चस्पा किया। बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई मुख्यमंत्री कार्यालय से प्राप्त एक शिकायत के आधार पर तेज की गई है। राजस्व और अल्पसंख्यक विभाग ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट वन विभाग को सौंप दी है, जिसके बाद बेदखली की प्रक्रिया शुरू हुई।
कोर्ट में क्या हुआ? केयरटेकर की बीमारी और वकील की दलील

सोमवार को डीएफओ कोर्ट में सुनवाई के दौरान मजार के मुख्य केयरटेकर फजले इलाही उपस्थित नहीं हो सके। उनके अधिवक्ता नदीम अहमद खान ने अदालत को बताया कि वे अस्वस्थ हैं और उनका मेडिकल प्रमाण पत्र पेश किया गया।
बचाव पक्ष के वकील ने अदालत में गूगल मैप (Google Maps) के जरिए निकाला गया एक नक्शा और ऐतिहासिकता से जुड़े कुछ दस्तावेज पेश किए। उन्होंने तर्क दिया कि यह दरगाह करीब 800 साल पुरानी है और इसका अस्तित्व वन क्षेत्र घोषित होने से पहले का है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मजार पक्ष को अब तक जमीन के मालिकाना हक से जुड़े ‘वैध टाइटल’ दस्तावेज पेश करने होंगे।
रास्ते बंद और उर्स पर रोक से मुस्लिम पक्ष में नाराजगी

मजार प्रबंधन का आरोप है कि प्रशासन द्वारा मजार की ओर जाने वाले रास्तों पर गहरे कटान कर दिए गए हैं, जिससे श्रद्धालु वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं। हाल ही में शबे-बरात के अवसर पर आयोजित होने वाले सालाना उर्स को भी वन विभाग ने सुरक्षा और नियमों का हवाला देकर रद्द कर दिया था। मजार के प्रबंधक मुस्तकीम राईन ने कहा, “इबादत पर रोक और रास्ते बंद किए जाने से समाज में निराशा है। हम जल्द ही इबादत की अनुमति के लिए कोर्ट से अपील करेंगे।”
वन विभाग का रुख: ‘बिना दस्तावेज के निर्माण अवैध’

वहीं, बढ़पुरा के वन रेंजर अशोक शर्मा का कहना है कि यह पूरा स्थल आरक्षित वन भूमि के भीतर आता है। विभाग का मुख्य आधार यह है कि मजार पक्ष के पास इस भूमि का कोई पुख्ता मालिकाना हक या वैध रजिस्ट्री नहीं है।
20 फरवरी को होगा फैसला?
अदालत ने मजार पक्ष को निर्देश दिया है कि वे 20 फरवरी तक जमीन से जुड़े सभी कानूनी कागजात और दावे जमा करें। इसी दिन डीएफओ की अदालत में अगली सुनवाई होगी, जिसके बाद यह तय होगा कि 800 साल पुरानी बताई जा रही इस मजार का भविष्य क्या होगा।


